म्योरपुर/सोनभद्र. @संदीप अग्रहरी…..

41वीं अंतरराज्यीय वॉलीबॉल प्रतियोगिता की प्रथम संध्या पर राजा चंडोल इंटरमीडिएट कॉलेज, लिलासी कला परिसर में शनिवार की देर शाम आयोजित काव्य-निशा ने खेल और साहित्य के सुंदर संगम का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। आयोजन ने यह संदेश दिया कि प्रतियोगिताएँ केवल मैदान तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि संस्कृति, संवेदना और सामाजिक चेतना को भी सशक्त करती हैं। कार्यक्रम का उद्घाटन सरस्वती जी के वंदन के साथ हुआ।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय से आए युवा एवं स्थापित कवियों ने अपनी सशक्त रचनाओं से मंच को जीवंत कर दिया। कवि शिवम सांवरा ने “हम पितृ धरोहर बेंचि दयों, मुलू चित्र तुम्हार धरो है अभी” से काव्य संध्या का आगाज किया। उनकी रचना में तीखापन और संवेदना का संतुलन स्पष्ट दिखा। बीएचयू के अंकित मिश्रा ने युवा मन के संघर्ष को स्वर देते हुए कहा “एक तहजीब थी जिस किसी से मिलो, हाथ पकड़े मगर यूँ दबाए नहीं”

सरल शब्दों में गहरी बात कहने की शैली ने खूब तालियाँ बटोरीं। वैभव अवस्थी ने “सौ करोड़ हिंदू हैं लेकिन हिंदुस्तान नहीं दिखता” पढ़कर श्रोताओं को गंभीर सोच के लिए विवश कर दिया। वत्सल रोहिल्ला ने “करें हम इश्क की बातें कई साल, मगर है एक मुसीबत वक्त कम है” के माध्यम से प्रेम और समय के द्वंद्व को सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया।
बीएचयू के अभिनंदन की रचनाओं में सामाजिक चेतना मुखर रही, जिसने विशेष रूप से युवाओं को प्रभावित किया। नगर उंटारी, झारखंड से आए कवि कमलेश ने मजदूर वर्ग की पीड़ा को स्वर देते हुए कहा “खुशियाँ हों या गम क्या फर्क पड़ेगा, एक बेबस मजदूर के घर बढ़ेगा तो बढ़ेगा, सिर्फ उसका कर्ज बढ़ेगा।” उनकी रचना ने सामाजिक यथार्थ को प्रभावी ढंग से उजागर किया।
कवि यथार्थ विष्णु ने “हम सोनभद्र की सोंधी-सोंधी मिट्टी से आते हैं” कहकर पूरे सभागार को भावुक कर दिया। कवि आकाश ने गीतात्मक शैली में “मन हजारों रंगों में रंगा, तन समाधि लगाता रहा” प्रस्तुत कर माहौल को संगीतमय बना दिया। लोक-संस्कृति की सजीव झलक डॉ लखन राम जंगली ने “संगी छहे बैठ बंसिया बजावे” तथा लोक-भाषा की अन्य रचनाओं के माध्यम से ग्रामीण संस्कृति और लोक-स्मृतियों को जीवंत कर दिया।
आशीष कुमार गुप्ता पढ़ा “अपनों ने ओढ़ ली ज़ुबाँ परायों सी, कैसे कह दूँ अपना अपना सा रहा।” उनकी प्रस्तुति में स्मृति, कृतज्ञता और मिट्टी से जुड़ाव स्पष्ट झलका। कवि गोष्ठी में रविकांत गुप्ता, रामनरेश जायसवाल, बर्फीलाल, जयंत कुमार, रामनारायण समेत विद्यालय के छात्र, शिक्षक, ग्रामीण और दूर-दराज से आए साहित्य प्रेमी बड़ी संख्या में मौजूद रहे।