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अजय यादव ने रुस में आयोजित इंटरनेशनल पावर लिफ्टिंग चैंपियनशिप में 75 किलो वेट कैटेगरी में 265 केजी वजन लिफ्ट किया है. इसके लिए उन्हें स्वर्ण पदक मिला है.

गया जिले के फतेहपुर प्रखंड के पुरनी बथान गांव के लाल अजय यादव ने एक बार फिर कमाल कर दिखाया है. रूस में आयोजित पावरलिफ्टिंग प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने बिहार और देश का नाम रोशन किया है. अजय यादव ने रुस में आयोजित इंटरनेशनल पावर लिफ्टिंग चैंपियनशिप में 75 किलो वेट कैटेगरी में 265 केजी वजन लिफ्ट किया है. इसके लिए उन्हें स्वर्ण पदक मिला है.

अजय यादव भारतीय सेना के जवान हैं. उन्होंने रिक्शा चलाकर और मजदूरी कर अपनी पढ़ाई की और फिर सेना में नौकरी प्राप्त की. उनकी नौकरी 2010 में हुई थी. इनकी सफलता की कहानी हर संघर्षशील युवाओं के लिए प्रेरणादायी है. इससे पहले अजय यादव ने कुछ माह पूर्व वियतनाम में आयोजित ऑल एशियन पावर लिफ्टिंग चैंपियनशिप में 82 किलो वेट कैटेगरी में 260 केजी वजन लिफ्ट किया था उसके लिए भी उन्हें स्वर्ण पदक मिला था.

गया शहर से लगभग 50 किलोमीटर दूर फतेहपुर प्रखंड के पुरनी बथान गांव के रहने वाले अजय यादव की सफलता जितनी चमकदार दिख रही है, उसके पीछे का संघर्ष उतना ही मुश्किल भरा रहा है. इनके घर की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी. पिताजी बैलगाड़ी चलाया करते थे और उसी से परिवार का गुजर बसर होता था. परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि स्कूल की फीस भी पूरी नहीं होती थी. उसके बाद उनका नामांकन सरकारी विद्यालय में करा दिया गया लेकिन घर की ऐसी स्थिति नहीं थी के उनकी पढ़ाई पर कुछ भी पैसे खर्च किए जा सके.
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अजय यादव का गांव पुरनी बथान झारखंड के कोडरमा जिले की सीमा से सटा हुआ है. इनके गांव से सटे झारखंड के कोडरमा जिले का एक पर्यटक स्थल ‘झुमरी तिलैया’ है. अजय छात्र जीवन में रविवार को वहां जाकर रिक्शा चलाते थे. दिनभर में 100-150 रुपये कमा कर घर आते थे. फिर उसी पैसे से पूरे सप्ताह की अपनी पढ़ाई और घर के खर्च में पिता का सहयोग करते थे.

मैट्रिक पास करने के बाद अजय यादव ने मजदूरी भी की. फिर इन्होंने अपने घर की आर्थिक स्थिति को देखकर फौज में जाने की तैयारी की. रिक्शा चलाकर पैसे जमा किए और फिर उसी पैसे से आर्मी की वैकेंसी का फॉर्म भरा. 2010 में भारतीय फौज में इनका सेलेक्शन हो गया. सेना में जाने के बाद इनके घर की स्थिति थोड़ी ठीक होने लगी लेकिन अभी इनके घर की स्थिति पहले जैसा ही है. सेना मे रहते हुए इन्होने जो वेतन उठाया उसी से घर परिवार को चलाया.

जब 2016 में इनकी पोस्टिंग असम कैंप में हुई, तभी उन्होंने अपनी फिटनेस के लिए जिम ज्वाइन किया. जहां उनकी ताकत और साहस को देखकर जिम ट्रेनर ने पावर लिफ्टिंग गेम खेलने के लिए प्रेरित किया. साल 2016 से पॉवर लिफ्टिंग की तैयारी शुरू की और फिर उन्होंने जिला स्तर, राज्य स्तर और नेशनल स्तर के गेम्स में कई मेडल जीते. उन्होंने हर प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल पर ही कब्जा जमाया है.
