रायबरेली. केला सिर्फ एक फल नहीं बल्कि किसानों की आजीविका और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है. लेकिन खेती करते समय कई बार पौधे रोगकारकों (पैथोजन) से नहीं, बल्कि पर्यावरणीय और पोषण संबंधी कारणों से प्रभावित हो जाते हैं. इन्हें अजैविक विकार कहा जाता है. यदि समय पर पहचान और वैज्ञानिक प्रबंधन नहीं किया गया तो उपज और गुणवत्ता दोनों घट जाते हैं. तो आइए जानते हैं केले की फसल अजैविक विकार क्या हैं? रायबरेली जिले के कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक विनय कुमार वर्मा लोकल 18 से बताते हैं कि सूखा, जलभराव, चरम तापमान, पोषक तत्वों की कमी, हवा से क्षति, सनबर्न, लवणता और शाकनाशी के गलत उपयोग जैसे कारण केले की खेती को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं.
ये काम जरूर कर लें
विनय कुमार वर्मा के मुताबिक केले के पौधों की पत्तियां बड़ी और वृद्धि तेज होती है, इसलिए इन्हें पर्याप्त नमी चाहिए. अनियमित वर्षा या पानी की कमी से सूखा तनाव होता है. इससे पत्तियां मुरझा जाती हैं. गुच्छे छोटे बनते हैं और उपज घट जाती है. खराब जल निकासी से जलभराव की समस्या पैदा होती है. ऐसी स्थिति में जड़ सड़ने लगती है. पौधे कमजोर पड़ जाते हैं और कभी-कभी मर भी जाते हैं. इसलिए ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग और जल निकासी चैनल बनाना जरूरी है.
केले की खेती 24 से 35 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर आदर्श रहती है, लेकिन जब गर्मी अधिक हो जाती है तो पत्तियों और फलों पर सनबर्न के दाग दिखाई देने लगते हैं. ठंड बढ़ने पर छद्म तना काला पड़ जाता है और पौधे की वृद्धि रुक जाती है. कई बार सर्दियों में गुच्छा बाहर नहीं निकलता, जिसे थ्रोट चोकिंग कहा जाता है. इन समस्याओं से बचने के लिए छायादार नेट, स्प्रिंकलर सिंचाई और विंडब्रेक का प्रयोग कारगर होता है.
पौधों की सेहत संतुलित पोषण पर निर्भर करती है. नाइट्रोजन की कमी से पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और पौधे का विकास रुक जाता है. पोटैशियम की कमी से फलों का आकार छोटा हो जाता है और गुच्छे कमजोर बनते हैं. मैग्नीशियम की कमी से पत्तियों में हरित लवक (क्लोरोफिल) टूटने लगता है. कैल्शियम की कमी से पत्तियां मुड़ जाती हैं और जड़ें कमजोर हो जाती हैं. इसलिए किसानों को समय-समय पर मिट्टी और पत्तियों का परीक्षण कराकर संतुलित उर्वरक और जैविक खाद का प्रयोग करना चाहिए.
हवा, सनबर्न और लवणता के खतरे
केले की जड़ें उथली और तना लंबा होता है, जिससे यह तेज हवा में आसानी से गिर जाता है. इससे पौधे टूट जाते हैं और उपज घट जाती है. खेत के चारों ओर विंडब्रेक लगाने और पौधों को सहारा देने से यह नुकसान कम होता है. तेज धूप में पत्तियां और फल झुलस जाते हैं. इसे रोकने के लिए पौधों के बीच उचित दूरी रखें और आवश्यकता पड़ने पर छाया नेट या कवर फसलें लगाएं. कुछ क्षेत्रों में मिट्टी की लवणता (खारापन) भी उत्पादन घटाती है. ऐसे में खेत में जिप्सम डालना, नमक-सहिष्णु पौधे लगाना और पर्याप्त सिंचाई करना बेहतर उपाय है.
गलत प्रयोग से सतर्कता जरूरी
खेत की खरपतवार नियंत्रण के लिए शाकनाशी का प्रयोग आम है, लेकिन अगर इनका उपयोग सही ढंग से न किया जाए तो केले के पौधे पर विपरीत असर पड़ता है. पत्तियों पर दाग, बौनापन और असामान्य वृद्धि इसके लक्षण हैं. इसलिए अनुशंसित शाकनाशी ही उचित मात्रा और सही समय पर प्रयोग करना चाहिए.
ऐसे करें बचाव
विनय कुमार वर्मा बताते हैं कि कि केले की खेती में अजैविक विकारों का समाधान वैज्ञानिक प्रबंधन से किया जा सकता है. सूखा तनाव से बचाव हेतु ड्रिप या माइक्रो-स्प्रिंकलर सिंचाई और मल्चिंग अपनाएं. जलभराव की स्थिति में उचित जल निकासी व्यवस्था करें. चरम तापमान पर नियंत्रण के लिए छायादार नेट, स्प्रिंकलर और विंडब्रेक का प्रयोग करें. पोषक तत्वों की कमी दूर करने के लिए मिट्टी और पत्ती परीक्षण आधारित संतुलित उर्वरक और जैविक खाद दें. तेज हवा से बचाव के लिए खेत के चारों ओर विंडब्रेक लगाएं और पौधों को सहारा दें. सनबर्न से बचने के लिए पौधों के बीच उचित दूरी और छाया व्यवस्था करें. लवणीय मिट्टी में जिप्सम का उपयोग और पर्याप्त सिंचाई करें. शाकनाशी का प्रयोग अनुशंसित मात्रा और सावधानीपूर्वक करें.