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Fragrant heritage of Ghazipur : गाजीपुर का नाम सिर्फ अफीम फैक्ट्री या ऐतिहासिक धरोहरों से ही नहीं जुड़ा है, बल्कि यहां की इत्र परंपरा भी पूरे देश में महक बिखेर रही है.स्टीमर घाट पर स्थित गुरु चरण राम गया राम इत्र की दुकान वर्ष 1836 से लगातार लोगों की यादों और रिश्तों को सुगंधित कर रही है.
गाजीपुर. उत्तर प्रदेश का गाजीपुर केवल अफीम फैक्ट्री या ऐतिहासिक धरोहरों के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि यहां की इत्र परंपरा भी देशभर में अपनी पहचान रखती है. स्टीमर घाट पर स्थित गुरु चरण राम गया राम इत्र की दुकान वर्ष 1836 से लगातार लोगों की यादों और रिश्तों को महका रही है. लगभग दो सदियों से चली आ रही यह खुशबूदार परंपरा अब आठवीं पीढ़ी के हाथों में है. आदित्य केसरी और उनके पिता श्याम केसरी, दादा लाल जी केसरी की देखरेख में इस धरोहर को आगे बढ़ा रहे हैं. दुकान के संचालक श्याम केसरी बताते हैं कि उनका गुलाब जल और इत्र पूरे भारत के बिरला मंदिरों में भेजा जाता है. भगवान के चरणों में चढ़ने वाला चंदन का इत्र और चरणामृत में डाला जाने वाला गुलाब जल सीधे गाजीपुर से पहुंचता है. यही नहीं, बिरला परिवार खुद भी इन इत्रों का उपयोग करता है. खाने-पीने से लेकर स्नान तक, गुलाब जल और इत्र उनकी जीवनशैली का अहम हिस्सा है.
पीढ़ियों से जुड़ी महकदार परंपरा
श्याम केसरी बताते हैं कि पहले केके बिड़ला (कृष्णकुमार बिड़ला) जी यहां से गुलाब जल और इत्र मंगवाते थे. उनके बाद उनकी बेटी नंदिनी बिड़ला जी भी इसका खूब इस्तेमाल करती रहीं. परिवार मिठाइयों और भोजन में इत्र डालकर खाता है, शरबत बनाता है और स्नान के समय गुलाब जल का प्रयोग करता है. यह परंपरा न सिर्फ व्यावसायिक लेन-देन है, बल्कि गाजीपुर की खुशबूदार पहचान का जीता-जागता उदाहरण है. हर साल 12 फरवरी से 28 फरवरी के बीच गाजीपुर से बड़े पैमाने पर इत्र और गुलाब जल बिरला मंदिरों व परिवार तक पहुंचता है. पहले श्याम केसरी खुद सामान लेकर जाते थे, लेकिन अब समय के साथ यह काम कोरियर के जरिए होता है. दर्जनों पेटियों में इत्र और गुलाब जल पैक होकर भेजा जाता है. इसके बदले दुकान को अच्छा-खासा मुनाफा भी मिलता है, लेकिन श्याम केसरी मानते हैं कि असली कमाई उनकी विरासत और पहचान का आगे बढ़ना है.
गाजीपुर की सांस्कृतिक धरोहर
स्टीमर घाट की यह इत्र की दुकान सिर्फ व्यापार का केंद्र नहीं, बल्कि गाजीपुर की सांस्कृतिक पहचान और गौरव का प्रतीक है. करीब दो सौ वर्षों से चली आ रही इस परंपरा ने शहर को देश के नक्शे पर एक अलग महकदार पहचान दी है. आज भी जब गुलाब जल और इत्र की खुशबू बड़े-बड़े मंदिरों और रईस घरानों तक पहुंचती है, तो गाजीपुर की मिट्टी और मेहनत की महक पूरे भारत में फैल जाती है.
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