अलीगढ़: मुस्लिम समुदाय में शादियों के दौरान निकाह में लड़के की ओर से लड़की को मेहर दी जाती है. इस्लाम में मेहर निकाह का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. यह पति की ओर से पत्नी के लिए एक अनिवार्य हक़ होता है, जो विवाह के समय तय किया जाता है. मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना इफराहीम हुसैन बताते हैं कि कुरआन और हदीस के अनुसार, मेहर केवल एक रस्म नहीं है, बल्कि यह औरत की इज्ज़त, सुरक्षा और उसके अधिकार की गारंटी है. यह पति की जिम्मेदारी और नीयत का सबूत है कि वह पत्नी के हक़ और इज्ज़त को समझता है.
मेहर की कोई फिक्स्ड रकम
मौलाना का कहना है कि मेहर की कोई फिक्स्ड रकम इस्लाम ने तय नहीं की है. बल्कि हालात, ज़रूरत और माली हालत के हिसाब से इसे रखा जा सकता है. यह रकम सोना, चांदी, नकद पैसा, ज़मीन, मकान, या कोई भी कीमती सामान हो सकती है. यहां तक कि अगर कोई गरीब है और पैसे की तंगी है तो वह कुरआन की कोई सूरह सिखाने या कोई नेक अमल भी मेहर के तौर पर रख सकता है. इस्लाम का मकसद मेहर को बोझ बनाना नहीं बल्कि औरत के हक़ की हिफाज़त करना है.
दो तरह का होता है मेहर
मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना इफराहीम हुसैन बताते हैं कि मेहर दो तरह का होता है. मेहर मुअज्जल (तुरंत अदा किया जाने वाला) और मेहर मुवज्जल (बाद में अदा किया जाने वाला). अक्सर शादी के वक्त मेहर का कुछ हिस्सा तुरंत अदा कर दिया जाता है और बाकी बाद के लिए तय रहता है. यह पति पर फर्ज़ है कि वह मेहर पूरा अदा करे, चाहे शादी के वक्त करे या बाद में.
औरत खुशी से माफ कर सकती है मेहर
जहाँ तक मेहर माफ़ करने का सवाल है, इस्लाम ने औरत को यह हक़ दिया है कि अगर वह अपनी खुशी से चाहे तो पति का बोझ हल्का करने के लिए मेहर माफ़ कर सकती है. मगर इसकी बुनियादी शर्त यह है कि औरत पर किसी तरह का दबाव या मजबूरी न हो, बल्कि वह दिल की पूरी रज़ामंदी से इसे माफ़ करे. कुरआन में भी आया है कि अगर वे अपनी मर्जी से कुछ हिस्सा छोड़ दें तो उसे खुशी से ले लो. यानी मेहर माफ़ करना पत्नी की इच्छा पर निर्भर करता है. यह पति का दबाव या समाज की मजबूरी से नहीं होना चाहिए.
मेहर, इस्लाम में औरत का एक बुनियादी हक़
मौलाना ने कहा कि इस तरह मेहर, इस्लाम में औरत का एक बुनियादी हक़ है, जिसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. यह शादी का हिस्सा है और पति की जिम्मेदारी है कि वह इसे अदा करे. वहीं, पत्नी चाहे तो अपने दिल की रज़ामंदी से इसे माफ़ कर सकती है. लेकिन यह उसकी पूरी आज़ादी और खुशी पर आधारित होना चाहिए.