कानपुर: पांच टन वजन, गुस्से से लाल आंखें और किसी की बात सुनने को तैयार नहीं. सामने जो भी आए, उसे कुचलने की ताकत रखने वाला हाथी जब अनियंत्रित होकर आबादी की ओर बढ़ने लगे तो अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं. काशी में 18 अक्टूबर को कुछ ऐसा ही खौफनाक मंजर देखने को मिला. मेले में पहुंचा टस्कर हाथी अचानक बेकाबू हो गया. अगर समय रहते उसे ट्रैंकुलाइज नहीं किया जाता तो वह आबादी या मेले की ओर पहुंचकर भारी तबाही मचा सकता था.
हालात बिगड़ते देख वन विभाग के अधिकारियों ने कानपुर चिड़ियाघर के निदेशक कन्हैया पटेल से मदद मांगी. इसके बाद वन्यजीवों के रेस्क्यू में माहिर डॉक्टर नासिर को काशी भेजा गया. डॉक्टर नासिर ने अपनी जान की परवाह किए बिना हाथी को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी संभाली. रात करीब 10:30 बजे से शुरू हुए ट्रैंकुलाइजेशन के प्रयास में तीन डार्ट गन का इस्तेमाल करना पड़ा. आधी रात के बाद हाथी को सुरक्षित तरीके से काबू कर एकांत स्थान पर पहुंचाया गया. अब हाथी सुरक्षित है.
हथिनी से दूरी बनी हाथी के बेकाबू होने की वजह
डॉक्टर नासिर के मुताबिक, यह टस्कर हाथी आजमगढ़ से एक मेला कार्यक्रम में लाया गया था. इसी दौरान वहां मौजूद हथिनी से वह दूर हो गया. हथिनी के हीट में होने के कारण हाथी की शारीरिक और हार्मोनल स्थिति में बदलाव आया. हाथी में टेस्टोस्टेरोन का स्तर बढ़ने और उत्तेजित व्यवहार के चलते उसे नियंत्रित करना चुनौतीपूर्ण हो गया. हाथी के पिछले पैर में चेन भी बंधी थी, लेकिन महावतों की कोशिश के बावजूद वह काबू में नहीं आ रहा था. वह अचानक किसी भी दिशा में मुड़ रहा था. आसपास शोर भी काफी था, जिससे स्थिति और मुश्किल हो रही थी.
डॉक्टर नासिर ने बताया कि हाथी के इस तरह अनियंत्रित होने पर सबसे बड़ा खतरा उसके आबादी की ओर बढ़ने का था. यदि वह मेले या लोगों की भीड़ में पहुंच जाता तो किसी बड़े हादसे से इनकार नहीं किया जा सकता था. ऐसे में वन विभाग की टीम ने हाथी को चारों तरफ से घेरकर सुरक्षित स्थान पर नियंत्रित करने की रणनीति बनाई.
पहली दो डार्ट गन बेअसर, तीसरी से आया काबू में
डॉक्टर नासिर के अनुसार, एशियाई हाथियों का वजन आमतौर पर चार से पांच टन तक हो सकता है. काशी में मौजूद टस्कर की उम्र करीब 30 साल आंकी गई. इतने भारी और ताकतवर हाथी को ट्रैंकुलाइज करना आसान नहीं था. रात करीब 10:30 बजे पहली डार्ट गन से दवा दी गई, लेकिन हाथी पर अपेक्षित असर नहीं दिखा. इसके बाद रात करीब 11:30 बजे दूसरी डार्ट गन का इस्तेमाल किया गया. इससे भी हाथी तत्काल पूरी तरह नियंत्रित नहीं हुआ.
इसके बाद रात करीब 12 बजे तीसरी डार्ट गन से दवा दी गई. इस बार दवा का असर हुआ और हाथी अचेत अवस्था में पहुंच गया. इसके बाद विशेषज्ञों की निगरानी में उसे सुरक्षित तरीके से एकांत स्थान पर ले जाया गया. डॉक्टर नासिर ने बताया कि ऐसे मामलों में हाथी के वजन, शारीरिक स्थिति और दवा के असर का लगातार आकलन करना जरूरी होता है. दवा की मात्रा का फैसला विशेषज्ञ ही करते हैं, क्योंकि गलत मात्रा जानलेवा साबित हो सकती है.
50 फीट की दूरी बना सकती है जान और मौत के बीच अंतर
डॉक्टर नासिर ने बताया कि अनियंत्रित हाथी के सामने सबसे जरूरी है कि लोग उससे सुरक्षित दूरी बनाए रखें. हाथी को नियंत्रित करने वाली टीम के लिए भी दूरी और आसपास का वातावरण बहुत मायने रखता है. उन्होंने बताया कि करीब 50 फीट की दूरी बनाए रखना जरूरी है, हालांकि यह हर स्थिति में पर्याप्त सुरक्षा की गारंटी नहीं है. हाथी की गति, उसके व्यवहार और आसपास के रास्तों को देखते हुए इससे भी अधिक दूरी की जरूरत पड़ सकती है.
उन्होंने कहा कि आसपास पेड़ और आड़ वाले स्थान हों तो रेस्क्यू टीम को रणनीति बनाने में मदद मिलती है. हालांकि आम लोगों को हाथी के पास जाकर पेड़ों के बीच से उसका पीछा करने या उसे घेरने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. हाथी के सामने जाना, उसे उकसाना या उसके करीब पहुंचकर फोटो और वीडियो बनाना जानलेवा हो सकता है.
डॉक्टर नासिर पहले भी कई खतरनाक वन्यजीवों का कर चुके हैं रेस्क्यू
कानपुर जू के डॉक्टर नासिर वन्यजीवों को सुरक्षित पकड़ने और उन्हें नियंत्रित करने के कई चुनौतीपूर्ण अभियानों का हिस्सा रह चुके हैं. वर्ष 2025 में उन्होंने लखनऊ के रहमानखेड़ा में आदमखोर बाघ के रेस्क्यू अभियान में भूमिका निभाई थी. वर्ष 2024 में फर्रुखाबाद में हिंसक तेंदुए और पीलीभीत में मादा तेंदुए के रेस्क्यू में भी उन्होंने काम किया. पीलीभीत में तेंदुए को सुरक्षित पकड़ने का अभियान करीब 110 दिनों तक चला था. इसके अलावा मिर्जापुर में भालू और फतेहपुर में हाइना के रेस्क्यू में भी वह शामिल रहे हैं.
डॉक्टर नासिर का कहना है कि हर वन्यजीव की प्रकृति और व्यवहार अलग होता है. हाथी जैसे विशाल जानवर के मामले में छोटी सी चूक भी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है. इसलिए ऐसे अभियानों में धैर्य, सही दूरी, विशेषज्ञों की टीम और परिस्थिति के अनुसार बनाई गई रणनीति सबसे महत्वपूर्ण होती है.
आपके सामने अचानक आ जाए अनियंत्रित हाथी तो ऐसे बचाएं जान
हाथी से दूर रहें: हाथी को देखते ही उसके पास जाने के बजाय उससे दूरी बढ़ाएं. करीब 50 फीट को भी पूरी तरह सुरक्षित दूरी न मानें. जरूरत पड़ने पर इससे बहुत अधिक दूरी बनाएं.
उसके रास्ते से हट जाएं: हाथी के सामने खड़े होकर उसे रोकने, डराने या भगाने की कोशिश न करें. उसके संभावित रास्ते से दूर किसी सुरक्षित स्थान पर चले जाएं.
मजबूत आड़ लें: यदि संभव हो तो किसी मजबूत इमारत या ठोस अवरोध के पीछे सुरक्षित जगह लें. केवल पेड़ के पीछे खड़े होने से सुरक्षा की गारंटी नहीं होती.
हाथी को घेरने की कोशिश न करें: हाथी के आसपास भीड़ न लगाएं. उसे पत्थर मारने, शोर मचाने, हॉर्न बजाने या फ्लैश के साथ वीडियो बनाने से बचें.
भागकर पास जाने या फोटो लेने की गलती न करें: हाथी के व्यवहार का अंदाजा लगाना मुश्किल हो सकता है. उसे छूने, खिलाने या उसके बच्चों अथवा दूसरी हथिनी के करीब जाने से बचें.
सुरक्षित स्थान पर पहुंचकर सूचना दें: वन विभाग, पुलिस या स्थानीय प्रशासन को तुरंत जानकारी दें. लोगों को हाथी की दिशा से दूर रहने के लिए सावधान करें, लेकिन खुद उसके करीब जाकर रास्ता रोकने की कोशिश न करें.
