भारत की कुराश प्लेयर पिंकी बलहारा ने एशियन गेम्स में सोमवार को ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया. सेमीफाइनल में दक्षिण कोरिया की सुमिन मो से 0-5 से हारकर उन्हें कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा. इसके बावजूद उन्होंने इतिहास रच दिया. वह कुराश में डबल एशियन गेम्स मेडल जीतने वालीं देश की पहली फाइटर बन चुकीं हैं. मगर पिंकी का सफर इतना आसान नहीं था.
दिल्ली की रहने वाली पिंकी ने 2018 के जकार्ता एशियाई खेलों में महिलाओं के 52 किग्रा से कम भार वर्ग के फाइनल में हारकर उन्हें सिल्वर मेडल मिला था, लेकिन इस बार वह 78 किग्रा भार वर्ग में उतरीं.
तीन मौतों ने सब कुछ बदल दिया
2018 में जब पिंकी बलहारा अपने पहले एशियन गेम्स की तैयारी कर रही थी, तब वह सिर्फ 19 साल की ही थी. इस कच्ची उम्र में ही उनकी जिंदगी तब बिखर गई, जब एक के बाद एक परिवार में तीन-तीन मौत हो गई. पहले उनके चचेरे भाई की मौत हुई, फिर दिल का दौरा पड़ने से उनके पिता गुजर गए और उसके बाद उनके दादाजी भी नहीं रहे. ये तीनों मौतें बहुत कम समय के अंतराल पर हुईं, जिससे इस टीनएजर के लिए इस सदमे से उबरना मुश्किल हो गया. पिंकी मीडिया से बातचीत करते हुए रोने लगीं. अपने आंसुओं को रोकते हुए उन्होंने बताया:
शुरू में मैं जर्काता जाना ही नहीं चाहती थी, लेकिन मेरे चाचा ने आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया. करियर को लेकर पिता की उम्मीदों की याद दिलाई. टूटे दिल से वह ट्रेनिंग पर लौटीं. रात में जिम जाती थीं क्योंकि डर था कि पिता की मौत के इतनी जल्दी बाद ट्रेनिंग पर लौटने के कारण लोग उन्हें गलत समझेंगे.
3500 साल पुराना कुराश का इतिहास
कुराश उज्बेकिस्तान की पारंपरिक कुश्ती और मार्शल आर्ट शैली है, जिसमें खिलाड़ियों को मुक्का मारने, लात चलाने या प्रतिद्वंद्वी के पैर पकड़ने की अनुमति नहीं होती. मुकाबले खड़े होकर होते हैं और अंक हासिल करने के लिए खिलाड़ी को प्रतिद्वंद्वी को पूरी ताकत और नियंत्रण के साथ पीठ के बल गिराना होता है.
लड़कों के साथ लड़ती हैं पिंकी
पिंकी की ट्रेनिंग का ज्यादातर हिस्सा लड़कों के साथ मुकाबले करते हुए गुजरता है. उनका मानना है कि इससे उन्हें ट्रेनिंग में मदद मिली. पिंकी की माने तो एकडेमी में उन्होंने कभी लड़कियों के साथ मुकाबला नहीं किया. वह लड़कों के साथ ही खेलती थी.
सिर्फ विरोधी नहीं ‘अपनों’ से भी लड़ाई
भारत में कुराश का कोई मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय महासंघ नहीं है और इससे जुड़े पक्षों के बीच लगातार मतभेद के कारण खिलाड़ियों को निजी सहयोग पर निर्भर रहना पड़ता है. पिंकी को भी दिल्ली स्थित अपने मामा की अकादमी से ही प्रशिक्षण और सहयोग मिलता है. पिंकी ने कहा कि हर एशियाई खेल से पहले एक नया महासंघ सामने आ जाता है, लेकिन खिलाड़ियों के हितों के लिए कोई ठोस काम नहीं होता.
9 साल की उम्र में मामा से प्रेरित होकर शुरू की ट्रेनिंग
पिंकी मुनिरका स्थित बाबा गंगनाथ जूडो एवं कुराश अकादमी में प्रशिक्षण लेती हैं, जिसका संचालन जाने-माने जूडो और कुराश कोच समुदंर तोकस करते हैं, जो पिंकी के मामा भी हैं. तोकस कोच बनने से पहले तोकस राष्ट्रीय स्तर के जूडो चैंपियन रह चुके हैं.

