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तेजस्विन शंकर ने रचा इतिहास… कॉमनवेल्थ गेम्स की डेकाथलॉन में मेडल जीतने वाले बने पहले भारतीय

Admin by Admin
September 13, 2026
in खेल
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तेजस्विन शंकर ने रचा इतिहास… कॉमनवेल्थ गेम्स की डेकाथलॉन में मेडल जीतने वाले बने पहले भारतीय

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नई दिल्ली. ग्लासगो की सर्द हवाओं और तनाव से भरी रातों के बीच, जब ‘ट्रैक एंड फील्ड’ के एथलीट अपनी सीमाओं को लांघ रहे थे, तब भारत के तेजस्विन शंकर एक इतिहास रचने की दहलीज पर खड़े थे. दो दिनों तक चली 10 बेहद कठिन और थकान से चूर कर देने वाली प्रतियोगिताओं डेकाथलन के बाद, जब अंतिम रेस की सीटी बजी, तो भारत के खाते में एक ऐसी उपलब्धि जुड़ चुकी थी जिसकी उम्मीद भारतीय एथलेटिक्स में दशकों से की जा रही थी. तेजस्विन शंकर राष्ट्रमंडल खेलों में पुरुषों की डेकाथलन स्पर्धा में पदक जीतने वाले भारत के पहले एथलीट बन गए हैं.

27 वर्षीय इस भारतीय स्टार तेजस्विन शंकर (Tejaswin Shankar) ने दो दिनों के लंबे और कड़े संघर्ष के बाद कुल 7,976 अंक हासिल किए और कांस्य पदक अपने नाम किया. उनकी यह जीत केवल एक पदक की कहानी नहीं है, बल्कि यह कहानी है उस अदम्य साहस, निरंतरता और खुद पर भरोसे की, जो किसी भी खिलाड़ी को इतिहास के पन्नों में अमर बना देती है. टॉप्स (टार्गेट ओलंपिक पोडियम स्कीम) डेवलपमेंट एथलीट तेजस्विन ने इस बहु-स्पर्धात्मक प्रतियोगिता में शुरू से अंत तक गजब का प्रदर्शन दिखाया.

तेजस्विन शंकर डेक्थलॉन में पदक जीतने वाले पहले भारतीय एथलीट बने.

अंतरराष्ट्रीय मंच पर कड़ा मुकाबला और बर्मिंघम का अनुभव
इस स्पर्धा का स्वर्ण पदक ग्रेनाडा के लिंडन विक्टर के नाम रहा, जिन्होंने 8,096 अंकों का विशाल स्कोर बनाकर अपना दबदबा बनाए रखा. वहीं कनाडा के दिग्गज डेमियन वार्नर 8,036 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर रहे और उन्होंने रजत पदक जीता. तेजस्विन ने इन दोनों महान खिलाड़ियों के साथ पोडियम साझा किया, जो उनके एथलेटिक करियर की सबसे सुनहरी यादों में से एक बन गया. यह तेजस्विन के लिए कोई पहला कॉमनवेल्थ मेडल नहीं था. चार साल पहले, उन्होंने बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में पुरुषों की ऊंची कूद (हाई जंप) में कांस्य पदक जीता था. लेकिन इस बार, उन्होंने सिर्फ एक इवेंट में नहीं, बल्कि 10 अलग-अलग इवेंट्स की शारीरिक और मानसिक परीक्षा पास करके खुद को साबित किया.

पहला दिन: फर्राटा रेस से लेकर लंबी और ऊंची कूद का जलवा
तेजस्विन की इस ऐतिहासिक यात्रा की शुरुआत प्रतियोगिता के पहले दिन बहुत ही सकारात्मक अंदाज़ में हुई. उन्होंने सबसे पहले 100 मीटर की फर्राटा रेस में कदम रखा, जहां उन्होंने 10.96 सेकंड का समय निकाला और 870 अंक अपने खाते में जोड़े. लेकिन उनका असली जलवा लॉन्ग जंप (लंबी कूद) में देखने को मिला. यहां तेजस्विन ने अपनी पूरी ताकत झोंकते हुए 7.82 मीटर की छलांग लगाई, जो उनका व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था. इस शानदार प्रयास ने उन्हें 1,015 का बड़ा स्कोर दिया और वे तालिका में तेज़ी से ऊपर चढ़े.

इसके बाद उनका पसंदीदा इवेंट ‘हाई जंप’ आया, जिसमें वे पहले से ही माहिर हैं. उन्होंने 2.15 मीटर की ऊंचाई को सफलतापूर्वक पार किया और 944 अंक हासिल किए. पहले दिन की समाप्ति तक तेजस्विन ने 4,339 अंक जुटा लिए थे. वे अंक तालिका में दूसरे स्थान पर थे और शीर्ष पर चल रहे कनाडा के डेमियन वार्नर से महज़ 14 अंक पीछे थे. पहले दिन के इस धमाकेदार प्रदर्शन ने पूरे भारतीय खेमे में पदक की उम्मीद जगा दी थी.

दूसरा दिन: बाधा दौड़, थ्रो और पोल वॉल्ट में कड़ा संघर्ष
दूसरे दिन की शुरुआत और भी अधिक चुनौतीपूर्ण थी क्योंकि शरीर की थकावट अपनी चरम सीमा पर पहुंचने लगी थी. इसके बावजूद, तेजस्विन के चेहरे पर दृढ़ संकल्प साफ झलक रहा था. उन्होंने दिन का आगाज़ 110 मीटर बाधा दौड़ (हर्डल्स) से किया, जिसे उन्होंने 14.41 सेकंड में पूरा करते हुए 922 अंक जुटाए. इसके बाद डिस्कस थ्रो में उन्होंने एक बार फिर अपना व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दोहराया और 40.44 मीटर थ्रो करके 674 अंक हासिल किए.

प्रतियोगिता जैसे-जैसे अपने अंतिम दौर की ओर बढ़ रही थी, रोमांच और दबाव बढ़ता जा रहा था. पोल वॉल्ट स्पर्धा में उन्होंने 4.30 मीटर की छलांग लगाकर 702 अंक जुटाए. इसके बाद जैवलिन थ्रो (भाला फेंक) में उन्होंने इस सीज़न का अपना सर्वश्रेष्ठ थ्रो करते हुए 53.12 मीटर दूर भाला फेंका, जिससे उन्हें 635 अंक मिले. इस थ्रो ने उन्हें निर्णायक 1500 मीटर रेस से ठीक पहले मजबूत तीसरे स्थान पर पहुंचा दिया.

1500 मीटर की अंतिम रेस और ऐतिहासिक जीत
अब सब कुछ अंतिम रेस ‘1500 मीटर’ पर निर्भर था. दो दिनों की दौड़-धूप, कूद और थ्रो के बाद शरीर पूरी तरह से टूट चुका था, लेकिन तेजस्विन का हौसला डिगा नहीं. उन्होंने अपनी बची हुई पूरी ताकत लगा दी और 4 मिनट 36.19 सेकंड का समय निकालकर 1500 मीटर रेस पूरी की. इस रेस से उन्हें 704 अंक मिले, जो उन्हें कांस्य पदक तक पहुंचाने और भारतीय एथलेटिक्स इतिहास में उनका नाम हमेशा के लिए दर्ज कराने के लिए काफ़ी थे. तेजस्विन शंकर का यह पदक आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाएगा कि जब हौसले बुलंद हों, तो सबसे कठिन रास्ते भी पार किए जा सकते हैं.

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