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प्यार की ‘छुअन’ कैसी हो सकती है? अगर इसे महसूस करना है, तो आपको 1980 की फिल्म देखनी चाहिए जिसे सई परांजपे ने निर्देशित किया था. उन्होंने थियेटर के मशहूर कलाकारों को लेकर ऐसी फिल्म बनाई, जिसकी गूंज आज भी दर्शक अपने दिलों में महसूस करते हैं. फिल्म में नसीरुद्दीन शाह ने नेत्रहीन प्रिंसिपल का किरदार निभाया था, जिसे शबाना आजमी के किरदार से प्यार हो जाता है. फिल्म 4 साल तक रिलीज को तरसती रही थी. जब यह रिलीज हुई, तो दो नेशनल फिल्म अवॉर्ड अपने नाम किए.
फिल्म को सई परांजपे ने डायरेक्ट किया था. (फोटो साभार: IMDb)
नई दिल्ली: अगर आप खाली वक्त में कुछ सुकूनदेह, गहरी फिल्म देखना चाहते हैं, तो आपकी ‘वॉच लिस्ट’ में फिल्म ‘स्पर्श’ होनी चाहिए. फिल्म में प्यार, रिश्ते और समाज की जटिलताओं को बड़ी सहजता से दिखाया गया है. 1980 की फिल्म को आईएमडीबी ने 7.9 रेटिंग दी है. फिल्म में दिखाया गया है कि एक नेत्रहीन प्रिंसिपल और टीचर के बीच प्यार पनपता जरूर है, मगर मन की उलझनें और हीन भावनाएं उनके रिश्ते पर हावी हो जाती हैं. उन्हें प्यार के उस ‘स्पर्श’ को फिर से महसूस करने के लिए मुश्किलों से जूझना पड़ता है. इसमें थियेटर के दिग्गज कलाकारों ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह और शबाना आजमी ने एक्टिंग की थी और सई परांजपे ने निर्देशित किया था.
फिल्म नेत्रहीन लोगों के साथ रिश्तों को संवेदनशीलता से दिखाती है. इसमें दो दुनियाओं के फर्क को दिखाने की कोशिश हुई है. सई परांजपे ने शानदार फिल्म बनाई थी, मगर इसे रिलीज होने में लगभग 4 साल की देरी हुई थी. मगर जब यह रिलीज हुई, तो इसने सबका ध्यान खींचा. इसने हिंदी में बेस्ट फीचर फिल्म का नेशनल अवॉर्ड जीता था. नसीरुद्दीन शाह को बेस्ट एक्टर का नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला, जबकि सई परांजपे ने बेस्ट स्क्रीनप्ले का अवॉर्ड अपने नाम किया.
(फोटो साभार: IMDb)
फिल्म को मिले कई अवॉर्ड्स
फिल्मफेयर अवॉर्ड में इसे दो बड़े अवॉर्ड मिले. फिल्म की कहानी दर्शकों को काफी कुछ सिखा जाती है. फिल्म की कहानी नेत्रहीनों के स्कूल के प्रिंसिपल अनिरुद्ध परमार इर्द-गिर्द बुनी गई है. देख पाने में अक्षम अनिरुद्ध की जिंदगी उदासी और अकेलेपन में गुजरती है. एक दिन उन्हें डॉक्टर के पास चेकअप के लिए जाते समय प्यारा सा गाना सुनाई देता है. वे डॉक्टर के पास जाने के बजाय उस घर के दरवाजे के पास पहुंच जाते हैं, जिसके अंदर से मंत्रमुग्ध कर देने वाली आवाज आ रही थी. वो आवाज कविता प्रसाद (शबाना) की है, जो शादी के तीन साल बाद विधवा हो गई थी. कविता भी अकेले रहना पसंद करती हैं. उनके बचपन की दोस्त मंजू ही उनकी एकमात्र साथी है. मंजू एक छोटी सी पार्टी रखती है, जहां कविता और अनिरुद्ध की मुलाकात होती है. वह उनकी आवाज से उन्हें पहचान लेते हैं. बातचीत के दौरान वह बताते हैं कि स्कूल को ऐसे वॉलंटियर्स की जरूरत है जो बच्चों को पढ़कर सुना सकें, गाना सिखा सकें, आर्ट-क्राफ्ट सिखा सकें और उनके साथ समय बिता सकें. कविता हिचकिचाती हैं, मगर समझाने के बाद वॉलंटियर बनने का फैसला करती हैं.
कविता और अनिरुद्ध की अधूरी प्रेम कहानी
फिल्म में आगे दिखाते हैं कि स्कूल में मिलते-जुलते हुए कविता और अनिरुद्ध को प्यार हो जाता है. वे सगाई कर लेते हैं, मगर उनकी शख्सियत अलग-अलग है. दोनों के रिश्ते में कई उतार-चढ़ाव आते हैं. अनिरुद्ध को लगता है कि कविता सिर्फ इस तरह की सेवा से अपनी जिंदगी के खालीपन को भरना चाहती हैं. उन्हें लगता है कि कविता ने शादी का ऑफर प्यार की वजह से नहीं, बल्कि अपनी उदास जिंदगी से बाहर निकलने के लिए स्वीकार किया है. कहानी आगे क्या मोड़ लेती है, इसे आप फिल्म में देखें, तो ही अच्छा होगा.
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अभिषेक नागर \’न्यूज18 डिजिटल\’ में सीनियर सब एडिटर के पद पर काम कर रहे हैं. दिल्ली के रहने वाले अभिषेक नागर \’न्यूज18 डिजिटल\’ की एंटरटेनमेंट टीम का हिस्सा हैं. उन्होंने एंटरटेनमेंट बीट के अलावा करियर, हेल्थ और…
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